आसान नहीं था भाजपा से जीत छिनना

आसान नहीं था भाजपा से जीत छिनना, सपा-रालोद गठबंधन ने मेरठ की सात विधानसभा सीटों में से चार पर जीत हासिल कर मेरठ को चर्चा में ला दिया है। अतुल प्रधान की सरधना से जीत ने सोच का दायरा बदला है और नए समीकरणों को जन्म दिया है। हालांकि यह सब सपा व रालोद संगठन के प्रबंधन व मेहनत से अधिक प्रत्याशियों की स्वयं की मेहनत और जनता के बीच में रहने का परिणाम माना जाएगा।

लोग के बीच रहने का फायदा मिला

शहर सीट पर रफीक अंसारी ने थोड़े वोट बढ़ाने के साथ लगभग पिछले चुनाव के मतों को कायम रखा। 2017 में रफीक ने एक लाख तीन हजार 140 वोट प्राप्त किए थे जबकि इस बार एक लाख छह हजार 395 वोट प्राप्त किए। रफीक इससे पहले 2012 में लड़े थे लेकिन जीत नहीं पाए थे। इस पांच साल में कोरोना का भी समय बीता, इसके बावजूद वह लोगों के बीच रहे। मुस्लिम वर्ग के बीच विश्वास बनाकर रखकर फिर से लगभग एकतरफा वोट पाकर जीतना उनके ही खुद के मेहनत वाले खाते में जाएगा।

रात दिन की मेहनत

सरधना सीट पर अतुल 2017 में करीब 21 हजार वोटों से हारे थे। उससे बाद वह उस क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहे। युवाओं की टीम तैयार की। इस बार उन्होंने करीब 18 हजार के अंतर से चुनाव जीत लिया। अतुल कहते हैं बहुत दिन की मेहनत है। जमीन कार्य किया। गरीबों की आवाज बना। रालोद ने भी सहयोग किया। किठौर पर शाहिद मंजूर जीते। शाहिद 2017 में भाजपा की जबरदस्त लहर में हार गए थे, मगर उससे पहले 2002, 2007 व 2012 में विधायक रहे। सपा सरकार में कैबिनेट मंत्री भी बने। शाहिद कहते हैं 2017 में भले ही हारे लेकिन लोगों के बीच रहकर दुख दर्द में साथ रहे। मुस्लिमों के साथ-साथ उन्होंने सभी वर्ग व जाति के लोगों का विश्वास जीता। कोरोना में उनके द्वारा की गयी मदद को लोग आज भी याद करते हैं।

हार गए थे लेकिन डटे रहे

ऐसा ही सिवालखास पर गुलाम मोहम्मद का अपना स्वयं का भी वजूद है। रालोद गठबंधन की वजह से उसका फायदा तो मिला ही मुस्लिम वोट पर भी पकड़ बनाए रहे। वह 2012 में यहीं से विधायक बने थे, लेकिन 2017 में हार गए थे। इसके बाद भी वह क्षेत्र में डटे रहे। सपा जिलाध्यक्ष राजपाल सिंह कहते हैं कि जो प्रत्याशी जीते हैं वे पार्टी में सांगठनिक रूप से भी सक्रिय रहते हैं। इससे कार्यकर्ताओं में भी उनकी पकड़ रही। सभी ने जुटकर मेहनत की। स्थानीय मुद्दों व अन्य बड़े मुद्दों को लेकर जनता के बीच सभी लोग गए। अखिलेश यादव व जयंत सिंह के आने से भी प्रभाव पड़ा।

किठौर विधानसभा सीट को शुरू से ही मंजूर परिवार का गढ माना जाता रहा है। हालांकि साल 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के सत्यबीर त्यागी ने उनसे यह सीट छीन ली थी, लेकिन इसके बाद भी शाहिद मंजूर व उनका पूरा परिवार किठौर विधानसभा क्षेत्र में डटा रहा। वहां से आने वालों का शाहिद मंजूर ने बगैर किसी भेदभाव के काम किया। इसके अलावा उनकी जमीनी नेता की छवि भी इस चुनाव में बहुत काम आयी। यह ठीक है कि इस सीट का मुस्लिम उन्हें एक तरफा पड़ा, लेकिन यदि गैर मुस्लिम की यदि बात की जाए तो किसी भी वर्ग की ओर से उन्हें निराशा हाथ नहीं लगी। सभी ने उन्हें वोट दिया।

इन्हीं तमाम कारणों के चलते भाजपा के कब्जे से सपा रालोद गठबंधन के इन धुरंधर प्रत्याशियों ने न केवल जीत छीनी बल्कि यह भी साबित कर दिया कि जनता सिर्फ काम करने वाले के साथ है। जनता उन्हें कभी नहीं भूलती जो उनके दुख सुख के साथी होते हैं। @Back To Home

 

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By editor1

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