अब गांधी जी के नाम पर नहीं जुटती भीड

अब गांधी जी के नाम पर नहीं जुटती भीड, तीन सौ साला अंग्रेजी हुकूमत से मुल्क को आजाद कराने वाले गांधी जी के नाम पर अब भीड़ नहीं जुटती। उनके नाम पर आयोजन फ्लॉप शो साबित हो रहे हैं। यह देखकर दुख भी होता है। इसके अलावा मेरठ का नाम भारत को आजादी दिलाने में सबसे पहले दिया जाता है, 1857 की क्रांति की गवाह बने इस शहर में आज यदि गांधी जी के दांडी मार्च के नाम पर होने वाले आयोजन में शामिल होने के लिए माननीयों पर वक्त नहीं, तो यह हमे जरूर सोचने पर विवश कर देता है कि हम किन्हें चुन रहे हैं। सवाल गैर वाजिव हो सकता है लेकिन ठीक वक्त पर ठीक सवाल उठाया है। अब गांधी जी के नाम पर नहीं जुटती भीड, कुछ दिन पहले की बात है चुनाव के दौरान रैलियों में अपार भीड़ जमा होती थी। इन रैलियों में नजर आने वाले नेता और उनके कार्यकर्ता लगता है कि दांड़ी मार्च व बापू को याद करना भूल गए। लेकिन निराश न हो, कुछ लोग व प्रशासन है जो राष्ट्रपिता को हमेशा सम्मान देते हैं। शनिवार को गांधी आश्रम से अपर जिलाधिकारी (नगर) दिवाकर सिंह, राष्ट्रपति पदक से अलंकृत सरबजीत सिंह कपूर,(प्रबुद्ध समाजिक कार्यकर्ता ), सलीम खान, गांधीआश्रम के सचिव प्रथ्वी सिंह रावत , के द्वारा दांडी मार्च का शुभारम्भ गांधी आश्रम से चरखा कात कर किया गया
राष्ट्रपति पदक से अलंकृत सरबजीत सिंह कपूर ने बताया की गांधीजी और उनके स्वयं सेवकों ने बताया की 12 मार्च, 1930 ई. को शुरू किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य था अंग्रेजों के ‘नमक कानून को तोड़ना’। गांधीजी ने साबरमती में अपने आश्रम से समुद्र की ओर चलना शुरू किया। आंदोलन की शुरुआत में 78 सत्याग्रहियों के साथ दांडी कूच के लिए निकले बापू के साथ दांडी पहुंचते-पहुंचते पूरा आवाम जुट गया था।
लगभग 25 दिन बाद 6 अप्रैल, 1930 ई. को दांडी पहुंचकर उन्होंने समुद्रतट पर नमक कानून तोड़ा। महात्मा गांधी ने दांडी यात्रा के दौरान सूरत, डिंडौरी, वांज, धमन के बाद नवसारी को यात्रा के आखिरी दिनों में अपना पड़ाव बनाया था। यहां से कराडी और दांडी की यात्रा पूरी की थी। नवसारी से दांडी का फासला लभभग 13 मील का है।
यह वह दौर था जब ब्रितानिया हुकूमत का चाय, कपड़ा और यहां तक कि नमक जैसी चीजों पर सरकार का एकाधिकार था। ब्रिटिश राज के समय भारतीयों को नमक बनाने का अधिकार नहीं था, बल्कि उन्हें इंग्लैंड से आने वाले नमक के लिए कई गुना ज्यादा पैसे देने होते थे। दांडी मार्च के बाद आने वाले महीनों में 80,000 भारतीयों को गिरफ्तार किया गया। इससे एक चिंगारी भड़की जो आगे चलकर ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ में बदल गई। गांधी आश्रम के कर्मचारी अपने हाथों मे तिरंगा झंडा लेकर चले। @Back To Home

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By editor1

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