ढाई फीसदी पर सिमटी कांग्रेस

ढाई फीसदी पर सिमटी कांग्रेस, पुराने कांग्रेसिसयों को ठिकाने लगाने का भुगतना पड़ा है खामियाजा। यूपी में प्रियंका के निजी सचिव ने किया बेड़ा गर्क। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उतरे प्रत्याशियों से ज्यादा वोट तो वार्ड के सभासद के चुनाव में उतरने वाले प्रत्याशी ले जाते हैं। इसके लिए विरोधी दलों को दोष देने के बजाए कांग्रेस नेतृत्व के बजाए अब कांग्रेसियों खास कर उन कांग्रेसियों को आत्ममंथन करना होगा,जो परिश्रम से ज्यादा परिक्रम पर विश्वास रखते हैं और इसी परिक्रम पद्धति या परिपाटी के चलते संगठन पर काविज भी होते रहते हैं। क्या ऐसे कांंग्रेसियों की इस चुनाव में कोई जिम्मेदारी नहीं बनती जो शहर, जिला, पीसीसी व एआईसीसी में तमाम संगठन पदों पर काविज हैं। चुनाव में प्रत्याशियों की मिट्टी पलीद के बाद पद से इस्तीफे की नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती। जब सोनिया गांधी इस्तीफा दे सकते हैं तो फिर ऐसे कांग्रेसी क्यों कुर्सी से चिपके हैं।

पुराने लगाए ठिकाने: पीसीसी के पूर्व सचिव चौधरी यशपाल सिंह की बात भले ही कडवी लगे, लेकिन है सच्चाई। यूपी समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की इस बुरी गत के लिए कोई और नहीं बल्कि खुद कांग्रेस नेतृत्व के बेतुके फैसले जिम्मेदार हैं। ढाई फीसदी पर सिमटी कांग्रेस, जब तक कांग्रेस पुराने व सीनियर कांग्रेसियों को दरबार की शोभा बढ़ाती रही, तब तक उसका प्रदर्शन विधानसभा चुनाव में 15 सौ वोटों तक नहीं पहुंचा था। बड़ा नुकसान फाइट स्टार संस्कृति वाले लग्जरी गाड़ियों में लदबद होकर चलने वाले नए चेहरों को अर्श पर पहुंचाने से हुआ। इन्हें न तो कोई पहचानता था न ही इनके नाम पर या चेहरे पर वोट मिलती। यह बात इसलिए भी कही जा रही है क्योंकि पिछले करीब तीन दशक से यूपी में कांग्रेस की लहर जैसी कोई चीज नहीं है। वो जमाना और था जब कांग्रेस के नाम पर किसी को भी टिकट दे दिया जाए और वो जीत कर आ जाता था।

कहां थे ये चेहरे: यहां सवाल प्रियंका गांधी के चेहरे पर नहीं है। सवाल है अजय लल्लू, धीरज गुजर व जेएनयू के पूर्व छात्र जो वामपंथी विचारधारा के माने जाते हैं यूपी कांग्रेस महासचिव के निजी सचिव पर है। इसमें कोई दो राय नहीं कि अजय लल्लू जुझारू व मेहनती नेता हैं, लेकिन चुनाव में फेस वेल्यू होती है जिस पर वोट मिलती हैं। चेहरों की यदि बात की जाए तो पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पुत्र व पूर्व केंद्रीय मंत्री अनिल शास्त्री का क्यों नहीं यूज किया गया। शास्त्री जी के पुत्र होने की वजह से उनके साथ लोगों की भावनाएं भी जुड़तीं। इनके अलावा प्रमोद शास्त्री कांग्रेस का ब्राहमण चेहरा, सलमान खुर्शीद मुस्लिम चेहरा, राजबब्बर जाना पहचाना चेहरा, बनारस के राजेश मिश्रा सरीखे ये वो चेहरे थे जिनका यूज किया जाता तो शायद यूपी में कांग्रेस ढाई फीसदी पर नहीं सिमटी।

403 बनाम 30 सीटें: यूपी में कांग्रेस सभी विधानसभा सीटों पर लड़ी थी, इसके इतर रालोद मात्र 30 सीटों पर मैदान में थी। रालोद की 8 आठ सीटें आयी हैं जबकि कांग्रेस दो पर ही सिमट कर रह गयी है। कांग्रेस का वोट प्रतिशत महज ढाई फीसदी जबकि रालोद का वोट फीसद 2.9 फीसदी पहुंंचा है।

मेरठ बुरी गत: अब यदि बात मेरठ की कर ली जाए तो मेरठ की सातों विधानसभा सीटों के तमाम प्रत्याशियाें को चुनाव लड़ने के नाम पर कांग्रेस की ओर से भरपूर मदद दी गयी। लेकिन सिवाल सीट के जगदीश शर्मा करीब 16 सौ वोट लेते हैं। हस्तिनापुर की अर्चना गौतम जिनके लिए खुद प्रियंका पहुंची थी महज 15 सौ पर सिमट जाती हैं। इसी तर्ज पर किठौर की बबीता गुजर 15 सौ पर सिमट कर जमानत गवां देती हैं। इसी सीट पर जब कांग्रेस के गोपाल काली लड़े थे तो 28 हजार वोट मिली थीं। यह होता है नए चेहरे पर दांव लगाने का अंतर। वोट की यदि बात की जाए तो इनसे ज्यादा तो वोट वार्ड के चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी ले जाते हैं। कैंट सीट पर कांग्रेस के टिकट पर जब पंजाबी चेहरा रमेश ढीगरा लड़े थे तो 13 हजार से ज्यादा वोट ले गए थे। पूर्व में एक उप चुनाव में जो परमात्मा शरण कंसल के निधन के बाद कराया गया था उस चुनाव में गाजियाबाद से आकर केके शर्मा लडे़ थे तो वो भी 17 हजार वोट ले गए थे। और अब जिलाध्यक्ष अवनीश काजला कैंट सीट से कितने मत ले  पाए हैं। यह अंतर होता है पुराने और नए चेहरे पर दांव लगाने का। दीवारों को पुतवा कर कोई भी नेता पहचान नहीं बना सकता न  ही वोट मिलती है। वोट मिलती है फेस वैल्यू पर। जरूरत बस इतनी है कि आत्ममंथन किया जाए। टिकट मांगने से पहले पब्लिक में अपना कद जरूर नाप लेना चाहिए। @Back To Home

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By editor1

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