मंडरा रहे हैं थर्ड वल्डवार के बादल

मंडरा रहे हैं थर्ड वल्डवार के बादल, रूस के यूक्रेन पर हमले को पूरे एक माह हो चुका है, इस जंग को लेकर जहां कुछ राजनायिक अमेरिका को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर नाटो देशाें पर जबरन यूक्रेन को युद्ध में धकेले जाने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। रूस के राष्ट्रपति पुतिन भी इस जंग थोपे जाने को लेकर अपने ही देश में आलोचना को शिकार हो रहे हैं। उनकी इमेज को दुनिया ही नहीं रूस में भी जबरदस्त धक्का पहुंचा है। उनके रूस में उनकी हीरो की छवि अब नहीं रही बतायी जा रही है। वहीं दूसरी ओर सबसे बड़ा सवाल यह पूछा जा रहा है कि क्या बेमियादी यह जंग थर्ड वल्डवार में तो नहीं बदलने जा रही है।  रूस यूक्रेन जंग के बीच उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) ने अपने पूर्वी हिस्‍सों में युद्ध समूहों की तैनाती की है। नाटो के इस कदम को एक तीसरे विश्‍व युद्ध की दस्‍तक के रूप में देखा जा रहा है। नाटो शिखर सम्‍मेलन में संगठन के महासचिव जेन्‍स स्‍टोलटेनबर्ग ने कहा कि हम उम्‍मीद करते हैं कि सहयोगी देश जमीन, हवा में और समुद्र में नाटो की स्थिति को मजबूत करने पर राजी होंगे। खास बात यह है कि नाटो देशों की यह तैयारी ऐसे समय हो रही है, जब यूक्रेन में रूसी परमाणु हमले का खतरा उत्‍पन्‍न हो गया है। यूक्रेन पर हाइपरसोनिक मिसाइल के हमले के बाद रूसी राष्‍ट्रपति पुतिन ने अपनी परमाणु टुकड़ी को हाई अलर्ट पर रखा है। इससे यह आशंका भी प्रबल हो गई है कि यूक्रेन की राजधानी कीव पर कब्‍जा करने के लिए रूस परमाणु शक्ति का प्रयोग कर सकता है। अगर रूसी राष्‍ट्रपति पुतिन यह कदम उठाते हैं तो यह जंग एक महायुद्ध में तब्‍दील हो सकता है। अब सारा दाराेमदार रूस के फैसले पर निर्भर करता है। नाटो की इस बैठक से चीन में भी खलबली मची है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्‍या रूस परमाणु युद्ध कर सकता है। क्‍या इस युद्ध में नाटो देशों का दखल शुरू होगा। अमेरिका ने चीन को क्‍यों धमकारमेया। आइए जानते हैं कि इन सब मसलों में क्‍या है विदेश मामलों के जानकार प्रो हर्ष वी पंत की राय। देखिए, यह कई बातों पर निर्भर करता है। रूस में लोकतांत्रिक सरकार नहीं है। वहां एक साम्‍यवादी सरकार है, जिसमें फैसला लेने का अधिकार रूसी राष्‍ट्रपति के पास है। परमाणु हमला करने के लिए उन्‍होंने सेना को अलर्ट मोड पर भी रखा है। यानी उन्‍होंने यूक्रेन की जनता और वहां की सरकार को खबरदार कर दिया है कि उनकी बातें मानों नहीं तो बर्बाद रहने को तैयार रहो। यह उनका अंतिम विकल्‍प है। इसके लिए उन्‍होंने अपने देश की सेना को तैयार रहने को कह दिया है। ऐसी स्थिति में अगर यूक्रेन की सरकार रूसी समझौते पर राजी नहीं हुई तो परमाणु हमला कोई अचंभे की घटना नहीं होगी। यूक्रेन जंग अब रूस और राष्‍ट्रपति पुतिन के लिए अस्मिता का प्रश्‍न बन गया है। इस युद्ध में रूसी सेना का भारी नुकसान हुआ है। ऐसे में पुतिन के समक्ष यह सवाल उठता है कि इस युद्ध में उन्‍होंने क्‍या हासिल किया। यह हो सकता है कि यह युद्ध भी वैसा ही हो जैसा अफगानिस्‍तान में अमेरिकी युद्ध था। अमेरिका में यह सवाल खड़ा हुआ था कि आखिर अफगानिस्‍तान युद्ध में अमेरिका को क्‍या हासिल हुआ। @Back To Home

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By editor1

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