एनजीटी को दिखते मेरठी अफसरों को नहीं

एनजीटी को दिखते मेरठी अफसरों को नहीं, सांसों को छीनने पर उतारू डग्गामार वाहनों को लेकर एनजीटी तो गंभीर है, लेकिन बिना रोकटोक सड़कों पर दौड़ रहे ये वाहन स्थानीय अफसरों को नजर नहीं आते। ना लाइसेंस की जरूरत ना ही आरटीओ कार्यालय से आरसी की जरूरत है। करना सिर्फ इतना है कि तमाम कायदे कानूनों को ताक पर रखो। जिस विभाग के स्टाफ से पकड़ धकड़ का डर है उस विभाग के अधिकारियों की मुट्टी गरम करो और उसके बाद दिन भर वातावरण में जहर घोलकर लोगों से उनकी प्राण वायु लूटते रहो। मेरठ समेत पूरे दिल्ली एनसीआर का कुछ ऐसा ही आलम है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूलन भले ही प्राण वायु को लेकर कितना ही गंभीर क्याें न हो। सुप्रीम कोर्ट अनेकों बार अफसरों को भले ही क्यों न फटकार लगा चुका हो, लेकिन इसके बाद भी सड़कों पर धुंए के नाम पर जहरीला कार्बन छोड़ रहे ऐसे वाहन अफसरों को नजर नहीं आते। या फिर यह मान लिया जाए कि मेरठ समेत एनसीआर के अफसर एनजीटी व सुप्रीम कोर्ट को लेकर गंभीर नहीं। ऐसा नहीं कि लोगों की सांसें छिनने पर उतारू ऐसे वाहनों के लिए कोई गंभीर या चिंतित नहीं। सामाजिक सरकारों से जुड़े विपुल सिंहल सरीखे कुछ कार्यकर्ता व उनकी संस्था ऐसे हवा मेंं जहर घोलने वाले ऐसे वाहनों को लेकर बेहद गंभीर हैं। विपुल सिंहल ने सोमवार की सुबह कुछ ऐसे ही वाहनों को अपने कैमरे में कैद कर इस मीडिया संस्थान को उनके चित्र भेजकर कुंभकर्णी नींद में सो रहे अफसरों को जगाने का आग्रह किया। एनजीटी को दिखते मेरठी अफसरों को नहीं, दिन निकलते ही ऐसे वाहन सड़कों पर इधर से उधर धुंआ छोड़ते देखे जा सकते हैं। सामान्य वाहनों के लिए तो आरटीओ व ट्रैफिक पुलिस के भी तमाम कायदे कानून तय किए गए हैं, उनके लिए आरसी, ड्राइविंगल लाइसेंस, इन्श्योरेंस, सीट बैल्ट व हेल्टमेट सरीखी तमाम अनिवार्यता हैं लेकिन स्कूटर व मोटर साइकिल सरीखे वाहनों के इंजनों को ठेलों में फिट करने के बाद उन्हें सड़कों पर बे-रोक टोक दौड़ाने वालों के लिए कोई कायदा कानून नहीं है। तेजी से दौड़ाओ और प्राण वायु को जहरीला करो, क्यों जिनकी जिम्मेदारी है वो तो सोए हैं। ऐसे अफसरों पर एनजीटी व सुप्रीमकोर्ट की फटकार का भी कोई असर नहीं पड़ता। @Back To Home

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By editor1

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